< Psalms 74 >

1 God, why have you abandoned/rejected us? Will you keep rejecting us forever [RHQ]? Why are you angry with us, since we are like sheep in your pasture [and you are like our shepherd]? [MET, RHQ]
आसाप का मश्कील हे परमेश्वर, तूने हमें क्यों सदा के लिये छोड़ दिया है? तेरी कोपाग्नि का धुआँ तेरी चराई की भेड़ों के विरुद्ध क्यों उठ रहा है?
2 Do not forget your people whom you chose long ago, the people whom you freed [from being slaves in Egypt] and caused to become your tribe. Do not forget Jerusalem, which was (your home/where you dwelt) [on this earth].
अपनी मण्डली को जिसे तूने प्राचीनकाल में मोल लिया था, और अपने निज भाग का गोत्र होने के लिये छुड़ा लिया था, और इस सिय्योन पर्वत को भी, जिस पर तूने वास किया था, स्मरण कर!
3 Walk along [and see] where everything has been totally ruined; our enemies have destroyed everything in the sacred temple.
अपने डग अनन्त खण्डहरों की ओर बढ़ा; अर्थात् उन सब बुराइयों की ओर जो शत्रु ने पवित्रस्थान में की हैं।
4 Your enemies shouted triumphantly in this sacred place; they erected their banners [to show they had defeated us].
तेरे द्रोही तेरे पवित्रस्थान के बीच गर्जते रहे हैं; उन्होंने अपनी ही ध्वजाओं को चिन्ह ठहराया है।
5 They cut down all the [engraved objects in the temple] like woodsmen cut down trees.
वे उन मनुष्यों के समान थे जो घने वन के पेड़ों पर कुल्हाड़े चलाते हैं;
6 Then they smashed all the carved wood with their axes and hammers.
और अब वे उस भवन की नक्काशी को, कुल्हाड़ियों और हथौड़ों से बिल्कुल तोड़े डालते हैं।
7 [Then] they burned your temple to the ground; they caused that place where you were worshiped to be unfit for people to worship in.
उन्होंने तेरे पवित्रस्थान को आग में झोंक दिया है, और तेरे नाम के निवास को गिराकर अशुद्ध कर डाला है।
8 They said to themselves, “We will destroy the Israelis completely,” and they [also] burned down all the other places where we gathered to worship God.
उन्होंने मन में कहा है, “हम इनको एकदम दबा दें।” उन्होंने इस देश में परमेश्वर के सब सभास्थानों को फूँक दिया है।
9 All our sacred symbols (OR, miracles) are gone; there are no prophets now/any more, and no one knows how long [this situation will continue].
हमको अब परमेश्वर के कोई अद्भुत चिन्ह दिखाई नहीं देते; अब कोई नबी नहीं रहा, न हमारे बीच कोई जानता है कि कब तक यह दशा रहेगी।
10 God, how long will our enemies make fun of you [RHQ]? Will they insult you [MTY] forever [RHQ]?
१०हे परमेश्वर द्रोही कब तक नामधराई करता रहेगा? क्या शत्रु, तेरे नाम की निन्दा सदा करता रहेगा?
11 Why do you refuse to help [MTY, RHQ] us? Why do you keep your hand inside your cloak [instead of using it to destroy our enemies] [RHQ]?
११तू अपना दाहिना हाथ क्यों रोके रहता है? उसे अपने पंजर से निकालकर उनका अन्त कर दे।
12 God, you have been our king [all the time] since we came out of Egypt [HYP], and you have enabled us to defeat [our enemies] in the land [of Israel].
१२परमेश्वर तो प्राचीनकाल से मेरा राजा है, वह पृथ्वी पर उद्धार के काम करता आया है।
13 By your power you caused the [Red] Sea to divide; [it was as though] you smashed the heads of the [rulers of Egypt who were like] huge sea dragons [MET].
१३तूने तो अपनी शक्ति से समुद्र को दो भागकर दिया; तूने तो समुद्री अजगरों के सिरों को फोड़ दिया।
14 [It was as though] you crushed the head of the king of Egypt [MET] and gave his body to the animals in the desert to eat.
१४तूने तो लिव्यातान के सिरों को टुकड़े-टुकड़े करके जंगली जन्तुओं को खिला दिए।
15 You caused springs and streams to flow, and you [also] dried up rivers that had never dried up previously.
१५तूने तो सोता खोलकर जल की धारा बहाई, तूने तो बारहमासी नदियों को सूखा डाला।
16 You created the days and the nights, and you put the sun and the moon in their places.
१६दिन तेरा है रात भी तेरी है; सूर्य और चन्द्रमा को तूने स्थिर किया है।
17 You determined where the oceans end and the land begins, and you created the summer/hot season and the winter/cold season.
१७तूने तो पृथ्वी की सब सीमाओं को ठहराया; धूपकाल और सर्दी दोनों तूने ठहराए हैं।
18 Yahweh, do not forget that your enemies laugh at you, and that it is foolish people who despise you [MTY].
१८हे यहोवा, स्मरण कर कि शत्रु ने नामधराई की है, और मूर्ख लोगों ने तेरे नाम की निन्दा की है।
19 Do not let your helpless people [MET] fall into the hands of their cruel enemies; do not forget your suffering/persecuted people.
१९अपनी पिण्डुकी के प्राण को वन पशु के वश में न कर; अपने दीन जनों को सदा के लिये न भूल
20 Do not forget the agreement that you made with us; remember that there are violent people in every dark place on the earth.
२०अपनी वाचा की सुधि ले; क्योंकि देश के अंधेरे स्थान अत्याचार के घरों से भरपूर हैं।
21 Do not allow your oppressed people to be disgraced; help those poor and needy people in order that they will [again] praise you [MTY].
२१पिसे हुए जन को अपमानित होकर लौटना न पड़े; दीन और दरिद्र लोग तेरे नाम की स्तुति करने पाएँ।
22 God, arise and defend yourself [by defending your people]! Do not forget that foolish people laugh at you (all day long/continually)!
२२हे परमेश्वर, उठ, अपना मुकद्दमा आप ही लड़; तेरी जो नामधराई मूर्ख द्वारा दिन भर होती रहती है, उसे स्मरण कर।
23 Do not forget that your enemies shout angrily [at you]; the uproar that they make [while they oppose you] never stops.
२३अपने द्रोहियों का बड़ा बोल न भूल, तेरे विरोधियों का कोलाहल तो निरन्तर उठता रहता है।

< Psalms 74 >